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mahabharat 5.56.10: वह ध्वजा सम्पूर्ण दिशाओं तथा चारों ओर तथा ऊपर एक योजन तक फैली हुई थी। विश्वकर्मा ने ऐसी माया रची है कि वृक्षों से ढक जाने या अवरुद्ध हो जाने पर भी वह ध्वजा कहीं अटकती नहीं।॥10॥   |   mahabharat अध्याय 5.56: संजयद्वारा अर्जुनके ध्वज एवं अश्वोंका तथा युधिष्ठिर आदिके घोड़ोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 56: संजयद्वारा अर्जुनके ध्वज एवं अश्वोंका तथा युधिष्ठिर आदिके घोड़ोंका वर्णन  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  5.56.10 
सर्वा दिशो योजनमात्रमन्तरं
स तिर्यगूर्ध्वं च रुरोध वै ध्वज:।
न सज्जतेऽसौ तरुभि: संवृतोऽपि
तथा हि माया विहिता भौमनेन॥ १०॥
 
 
अनुवाद
वह ध्वजा सम्पूर्ण दिशाओं तथा चारों ओर तथा ऊपर एक योजन तक फैली हुई थी। विश्वकर्मा ने ऐसी माया रची है कि वृक्षों से ढक जाने या अवरुद्ध हो जाने पर भी वह ध्वजा कहीं अटकती नहीं।॥10॥
 
That flag covered all directions and the space around and above it upto a distance of one Yojana. Vishwakarma has created such a Maya that the flag does not get stuck anywhere even if it is covered or obstructed by trees.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)