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mahabharat 5.54.3: भरतकुलभूषण महाराज! आप (स्वभाव से ही) पाण्डवों के प्रति द्वेष रखने वाले हैं। अतः इस समय आपने जो मत व्यक्त किया है, वह सदा के लिए नहीं रहेगा। आपने प्रारम्भ से ही कुन्तीपुत्रों के साथ छल किया है॥3॥   |   mahabharat अध्याय 5.54: संजयका धृतराष्ट्रको उनके दोष बताते हुए दुर्योधनपर शासन करनेकी सलाह देना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 54: संजयका धृतराष्ट्रको उनके दोष बताते हुए दुर्योधनपर शासन करनेकी सलाह देना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  5.54.3 
नैष कालो महाराज तव शश्वत् कृतागस:।
त्वया ह्येवादित: पार्था निकृता भरतर्षभ॥ ३॥
 
 
अनुवाद
भरतकुलभूषण महाराज! आप (स्वभाव से ही) पाण्डवों के प्रति द्वेष रखने वाले हैं। अतः इस समय आपने जो मत व्यक्त किया है, वह सदा के लिए नहीं रहेगा। आपने प्रारम्भ से ही कुन्तीपुत्रों के साथ छल किया है॥3॥
 
Bharatkulbhushan Maharaj! You are (by nature) the one who offends against the Pandavas. Therefore, the opinion expressed by you at this time will not remain forever. From the very beginning, you have behaved deceitfully with the sons of Kunti.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)