श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 52: धृतराष्ट्रद्वारा अर्जुनसे प्राप्त होनेवाले भयका वर्णन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  5.52.18 
यथा कक्षं महानग्नि: प्रदहेत् सर्वतश्चरन्।
महार्चिरनिलोद्‍धूतस्तद्वद् धक्ष्यति मामकान्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
जैसे वायु के वेग से प्रज्वलित अग्नि सब दिशाओं में फैल जाती है और अपनी प्रज्वलित लपटों से घास और वन को जलाकर राख कर देती है, उसी प्रकार अर्जुन मेरे पुत्रों को जलाकर भस्म कर देगा॥18॥
 
Just as a fire, carried by the speed of the wind, spreads in all directions and with its blazing flames burns the grass and the forest to ashes, in the same manner Arjuna will burn my sons to ashes.॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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