vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 5: उद्योग पर्व
»
अध्याय 51: भीमसेनके पराक्रमसे डरे हुए धृतराष्ट्रका विलाप
»
श्लोक 53
श्लोक
5.51.53
न तु मन्ये विघाताय ज्ञानं दु:खस्य संजय।
भवत्यतिबलं ह्येतज्ज्ञानस्याप्युपघातकम्॥ ५३॥
अनुवाद
संजय! मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि ज्ञान दुःख का नाश नहीं कर सकता; अपितु घोर दुःख ही ज्ञान का नाश करने वाला हो जाता है ॥53॥
Sanjay! It seems to me that knowledge cannot destroy sorrow; rather, intense sorrow itself becomes the destroyer of knowledge. ॥ 53॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×