श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 49: भीष्मका दुर्योधनको संधिके लिये समझाते हुए श्रीकृष्ण और अर्जुनकी महिमा बताना एवं कर्णपर आक्षेप करना, कर्णकी आत्मप्रशंसा, भीष्मके द्वारा उसका पुन: उपहास एवं द्रोणाचार्यद्वारा भीष्मजीके कथनका अनुमोदन  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  5.49.42 
एतान्यस्य मृषोक्तानि बहूनि भरतर्षभ।
विकत्थनस्य भद्रं ते सदा धर्मार्थलोपिन:॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
हे भारतश्रेष्ठ! तुम्हारा कल्याण हो। यह कर्ण व्यर्थ ही शेखी बघारता रहता है। इसकी अनेक बातें इसी प्रकार मिथ्या हैं। यह धर्म और अर्थ दोनों का नाश करने वाला है॥ 42॥
 
‘Bhaarat's best! May you be blessed. This Karna keeps boasting in vain. Many of the things he says are false like this. He is going to destroy both Dharma and Artha.॥ 42॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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