श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 49: भीष्मका दुर्योधनको संधिके लिये समझाते हुए श्रीकृष्ण और अर्जुनकी महिमा बताना एवं कर्णपर आक्षेप करना, कर्णकी आत्मप्रशंसा, भीष्मके द्वारा उसका पुन: उपहास एवं द्रोणाचार्यद्वारा भीष्मजीके कथनका अनुमोदन  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  5.49.33 
वैशम्पायन उवाच
कर्णस्य तु वच: श्रुत्वा भीष्म: शान्तनव: पुन:।
धृतराष्ट्रं महाराज सम्भाष्येदं वचोऽब्रवीत्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं- राजा जनमेजय! कर्ण की बातें सुनकर शान्तनुपुत्र भीष्म ने राजा धृतराष्ट्र को सम्बोधित करके पुनः इस प्रकार कहा॥ 33॥
 
Vaishmpayana says: King Janamejaya! After listening to Karna's words, Shantanu's son Bhishma addressed King Dhritarashtra and said again thus:॥ 33॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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