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mahabharat 5.49.29: कर्ण ने कहा— पितामह! आपने मेरे लिए जो शब्द कहे हैं, वे अनुचित हैं। आप जैसे वृद्ध पुरुष को ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए। मैं क्षत्रिय धर्म में स्थित हूँ और अपने धर्म से कभी विचलित नहीं हुआ हूँ॥ 29॥   |   mahabharat अध्याय 5.49: भीष्मका दुर्योधनको संधिके लिये समझाते हुए श्रीकृष्ण और अर्जुनकी महिमा बताना एवं कर्णपर आक्षेप करना, कर्णकी आत्मप्रशंसा, भीष्मके द्वारा उसका पुन: उपहास एवं द्रोणाचार्यद्वारा भीष्मजीके कथनका अनुमोदन   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 49: भीष्मका दुर्योधनको संधिके लिये समझाते हुए श्रीकृष्ण और अर्जुनकी महिमा बताना एवं कर्णपर आक्षेप करना, कर्णकी आत्मप्रशंसा, भीष्मके द्वारा उसका पुन: उपहास एवं द्रोणाचार्यद्वारा भीष्मजीके कथनका अनुमोदन  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  5.49.29 
कर्ण उवाच
नैवमायुष्मता वाच्यं यन्मामात्थ पितामह।
क्षत्रधर्मे स्थितो ह्यस्मि स्वधर्मादनपेयिवान्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
कर्ण ने कहा— पितामह! आपने मेरे लिए जो शब्द कहे हैं, वे अनुचित हैं। आप जैसे वृद्ध पुरुष को ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए। मैं क्षत्रिय धर्म में स्थित हूँ और अपने धर्म से कभी विचलित नहीं हुआ हूँ॥ 29॥
 
Karna said— Grandfather! The words you have used for me are inappropriate. An old man like you should not say such things. I am established in the Kshatriya Dharma and have never deviated from my Dharma.॥ 29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)