श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 49: भीष्मका दुर्योधनको संधिके लिये समझाते हुए श्रीकृष्ण और अर्जुनकी महिमा बताना एवं कर्णपर आक्षेप करना, कर्णकी आत्मप्रशंसा, भीष्मके द्वारा उसका पुन: उपहास एवं द्रोणाचार्यद्वारा भीष्मजीके कथनका अनुमोदन  »  श्लोक 27-28
 
 
श्लोक  5.49.27-28 
त्रयाणामेव च मतं तत् त्वमेकोऽनुमन्यसे।
रामेण चैव शप्तस्य कर्णस्य भरतर्षभ॥ २७॥
दुर्जाते: सूतपुत्रस्य शकुने: सौबलस्य च।
तथा क्षुद्रस्य पापस्य भ्रातुर्दु:शासनस्य च॥ २८॥
 
 
अनुवाद
भरतश्रेष्ठ! आप ही खोति जाति के पुत्र कर्ण, सुबल के पुत्र शकुनि तथा परशुरामजी द्वारा शापित अपने नीच एवं पापी भाई दु:शासन की सम्मति का अनुमोदन करने वाले तथा उसका पालन करने वाले हैं ॥27-28॥
 
Bharatshrestha! You are the only one who approves and follows the opinion of Karna, son of Khoti caste and Shakuni, son of Subal and your lowly and sinful brother Dushasan, who were cursed by Parshuramji. 27-28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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