श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 48: संजयका कौरवसभामें अर्जुनका संदेश सुनाना  »  श्लोक 86-87
 
 
श्लोक  5.48.86-87 
अस्मै वराण्यददंस्तत्र देवा
दृष्ट्वा भीमं कर्म कृतं रणे तत्।
श्रमश्च ते युध्यमानस्य न स्या-
दाकाशे चाप्सु च ते क्रम: स्यात्॥ ८६॥
शस्त्राणि गात्रे न च ते क्रमेर-
न्नित्येव कृष्णश्च तत: कृतार्थ:।
एवंरूपे वासुदेवेऽप्रमेये
महाबले गुणसम्पत् सदैव॥ ८७॥
 
 
अनुवाद
युद्ध में भगवान कृष्ण का भयंकर पराक्रम देखकर देवताओं ने उन्हें निम्नलिखित वर दिए - 'केशव! युद्ध करते समय तुम कभी थको नहीं, आकाश और जल में निर्विघ्न विचरण करो और कोई भी अस्त्र तुम्हारे शरीर को क्षति न पहुँचा सके।' इन वर प्राप्त करके कृष्ण पूर्णतः सफल हो गए। इस असीम पराक्रमी महाबली वासुदेव में समस्त गुण और ऐश्वर्य सदैव विद्यमान रहते हैं।
 
‘Seeing the dreadful prowess of Lord Krishna in the war, the gods gave him the following boons – ‘Keshav! May you never get tired while fighting, may you move unhindered in the sky and water and may no weapon be able to harm your body.’ Having received these boons, Krishna has become completely successful. All the qualities and riches are always present in this infinitely powerful Mahabali Vasudeva. 86-87.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)