श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 48: संजयका कौरवसभामें अर्जुनका संदेश सुनाना  »  श्लोक 67-68
 
 
श्लोक  5.48.67-68 
पूर्वाह्णे मां कृतजप्यं कदाचिद्
विप्र: प्रोवाचोदकान्ते मनोज्ञम्।
कर्तव्यं ते दुष्करं कर्म पार्थ
योद्धव्यं ते शत्रुभि: सव्यसाचिन्॥ ६७॥
इन्द्रो वा ते हरिमान् वज्रहस्त:
पुरस्ताद् यातु समरेऽरीन् विनिघ्नन्।
सुग्रीवयुक्तेन रथेन वा ते
पश्चात् कृष्णो रक्षतु वासुदेव:॥ ६८॥
 
 
अनुवाद
एक दिन मैं प्रातःकाल संध्यावन्दन और गायत्री जप करके बैठा था, उसी समय एक ब्राह्मण ने आकर मुझसे एकान्त में ये मधुर वचन कहे - 'कुन्तीनन्दन! तुम्हें कठोर परिश्रम करना होगा। सव्यसाचिन! तुम्हें शत्रुओं से युद्ध करना होगा। बोलो, तुम क्या चाहते हो? इन्द्र उच्चैः युद्धस्थल में तुम्हारे आगे-आगे घोड़े पर सवार होकर हाथ में वज्र लेकर तुम्हारे शत्रुओं का नाश करने वाले श्रवा चलें अथवा सुग्रीव के समान घोड़ों से जुते हुए रथ पर बैठे हुए वसुदेवनन्दन भगवान श्रीकृष्ण पीछे से तुम्हारी रक्षा करें। 67-68॥
 
One day, I was sitting in the morning after performing evening prayers and chanting Gayatri, at that time a Brahmin came and said these sweet words to me in private - 'Kuntinandan! You have to do hard work. Savyasachin! You will have to fight with your enemies. Tell me, what do you want? Indra Uchai: May Shrava, sitting on a horse, move ahead of you in the battlefield, destroying your enemies with a thunderbolt in his hand, or may Vasudevanandan Lord Krishna, sitting on a chariot harnessed to horses like Sugriva, protect you from behind. 67-68॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)