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mahabharat 5.48.64: जब धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन मेरे गांडीव धनुष को रथ पर, भगवान श्रीकृष्ण को सारथी के रूप में, दिव्य पांचजन्य शंख को, रथ में जुते हुए दिव्य घोड़ों को, बाणों से भरे हुए दो अक्षय तरकशों को, मेरे देवदत्त नामक शंख को तथा मुझे देखेगा, तब वह युद्ध के परिणाम के बारे में सोचकर बहुत व्याकुल हो जाएगा।   |   mahabharat अध्याय 5.48: संजयका कौरवसभामें अर्जुनका संदेश सुनाना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 48: संजयका कौरवसभामें अर्जुनका संदेश सुनाना  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  5.48.64 
यदा रथे गाण्डिवं वासुदेवं
दिव्यं शङ्खं पाञ्चजन्यं हयांश्च।
तूणावक्षय्यौ देवदत्तं च मां च
द्रष्टा युद्धे धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत्॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
जब धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन मेरे गांडीव धनुष को रथ पर, भगवान श्रीकृष्ण को सारथी के रूप में, दिव्य पांचजन्य शंख को, रथ में जुते हुए दिव्य घोड़ों को, बाणों से भरे हुए दो अक्षय तरकशों को, मेरे देवदत्त नामक शंख को तथा मुझे देखेगा, तब वह युद्ध के परिणाम के बारे में सोचकर बहुत व्याकुल हो जाएगा।
 
When Duryodhana, son of Dhritarashtra, sees my Gandiva bow on the chariot, Lord Krishna as his charioteer, his divine Panchjanya conch, divine horses harnessed to the chariot, two inexhaustible quivers filled with arrows, my conch called Devadatta and me, he will be greatly distressed at the thought of the outcome of the war.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)