श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 48: संजयका कौरवसभामें अर्जुनका संदेश सुनाना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  5.48.13 
मायोपध: प्रणिपातार्जवाभ्यां
तपोदमाभ्यां धर्मगुप्त्या बलेन।
सत्यं ब्रुवन् प्रतिपन्नो नृपो न-
स्तितिक्षमाण: क्लिश्यमानोऽतिवेलम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
हमारे राजा युधिष्ठिर नम्रता, सरलता, तप, संयम, धर्मरक्षा और बल- इन सभी गुणों से संपन्न हैं। वे दीर्घकाल तक अनेक प्रकार के कष्ट सहते हुए भी सदैव सत्य बोलते हैं और कौरवों के कपटपूर्ण व्यवहार और वचनों को सहन करते हैं॥13॥
 
Our King Yudhishthira is endowed with all the virtues - humility, simplicity, austerity, self-control, protection of Dharma and strength. Despite suffering many kinds of troubles for a long time, he always speaks the truth and tolerates the deceitful behavior and words of the Kauravas.॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)