श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 48: संजयका कौरवसभामें अर्जुनका संदेश सुनाना  »  श्लोक 102
 
 
श्लोक  5.48.102 
अनालब्धं जृम्भति गाण्डिवं धनु-
रनाहता कम्पति मे धनुर्ज्या।
बाणाश्च मे तूणमुखाद् विसृत्य
मुहुर्मुहुर्गन्तुमुशन्ति चैव॥ १०२॥
 
 
अनुवाद
‘गाण्डीव धनुष बिना स्पर्श किये ही प्रत्यंचा चढ़ा जा रहा है, मेरे धनुष की डोरी बिना खींचे ही हिल रही है और मेरे बाण बार-बार तरकस से निकलकर शत्रुओं की ओर जाने के लिए अधीर हो रहे हैं ॥102॥
 
‘The Gandiva bow is being strung without being touched, the string of my bow is moving without being pulled and my arrows are repeatedly getting impatient to come out of the quiver and go towards the enemies.॥ 102॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)