Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 5.44.23: राजन! जो इस ब्रह्मचर्य का आश्रय लेता है, वह ब्रह्मचर्यपूर्वक यम-नियमादि तप का अभ्यास करके अपने सम्पूर्ण शरीर को पवित्र बना लेता है और इससे विद्वान् पुरुष निश्चित ही अबोध बालक के समान राग-द्वेष से शून्य हो जाता है और अन्त में मृत्यु को भी जीत लेता है॥23॥ | mahabharat अध्याय 5.44: ब्रह्मचर्य तथा ब्रह्मका निरूपण । mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
य आश्रयेत् पावयेच्चापि राजन्
सर्वं शरीरं तपसा तप्यमान:।
एतेन वै बाल्यमभ्येति विद्वान्
मृत्युं तथा स जयत्यन्तकाले॥ २३॥
अनुवाद
राजन! जो इस ब्रह्मचर्य का आश्रय लेता है, वह ब्रह्मचर्यपूर्वक यम-नियमादि तप का अभ्यास करके अपने सम्पूर्ण शरीर को पवित्र बना लेता है और इससे विद्वान् पुरुष निश्चित ही अबोध बालक के समान राग-द्वेष से शून्य हो जाता है और अन्त में मृत्यु को भी जीत लेता है॥23॥
Rajan! One who takes shelter of this celibacy, by practicing the celibate Yama-Niyamadi penance, makes his entire body pure and by this, the learned man definitely becomes void of love and hatred like an innocent child and in the end, he conquers even death. 23॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥