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mahabharat 5.43.7: सनत्सुजाता ने कहा- महानुभाव! यह जगत् परमेश्वर के नाम और विशेष रूपों से ही प्रत्यक्ष है। वेदों में ऐसा स्पष्ट निर्देश है, किन्तु वास्तव में इसका स्वरूप इस जगत् से विलक्षण बताया गया है। 7॥   |   mahabharat अध्याय 5.43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  5.43.7 
सनत्सुजात उवाच
तस्यैव नामादिविशेषरूपै-
रिदं जगद् भाति महानुभाव।
निर्दिश्य सम्यक् प्रवदन्ति वेदा-
स्तद् विश्ववैरूप्यमुदाहरन्ति॥ ७॥
 
 
अनुवाद
सनत्सुजाता ने कहा- महानुभाव! यह जगत् परमेश्वर के नाम और विशेष रूपों से ही प्रत्यक्ष है। वेदों में ऐसा स्पष्ट निर्देश है, किन्तु वास्तव में इसका स्वरूप इस जगत् से विलक्षण बताया गया है। 7॥
 
Sanatsujata said- Excellency! This world is visible only through the name and special forms of the Supreme God. The Vedas say this in very clear instructions, but in reality its form is said to be unique from this world. 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)