श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  5.43.57 
नास्य पर्येषणं गच्छेत् प्राचीनं नोत दक्षिणम्।
नार्वाचीनं कुतस्तिर्यङ्नादिशं तु कथञ्चन॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
इस आत्मा की खोज के लिए पूर्व, दक्षिण, पश्चिम या उत्तर दिशा में जाने की आवश्यकता नहीं है; फिर दक्षिण-पूर्व आदि दिशाओं की क्या बात है? इसी प्रकार दिशा-विभाजन से रहित क्षेत्र में भी इसकी खोज नहीं करनी चाहिए ॥ 57॥
 
To search for this Self, there is no need to go towards the east, south, west or north; then what about the south-east and other directions? Similarly, one should not search for it even in a region which is devoid of division of directions. ॥ 57॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)