न वेदानां वेदिता कश्चिदस्ति
वेद्येन वेदं न विदुर्न वेद्यम्।
यो वेद वेदं स च वेद वेद्यं
यो वेद वेद्यं न स वेद सत्यम्॥ ५३॥
अनुवाद
जाननेवालों में वेदों को अर्थात् उनके रहस्यों को कोई नहीं जानता; क्योंकि न तो वेदों के रहस्यों को कोई जान सकता है और न जानने के मार्ग में आनेवाले मन-बुद्धि आदि साधनों से जाननेयोग्य ईश्वरीय तत्त्व को ही कोई जान सकता है। जो पुरुष केवल वेदों को जानता है, वह विधि का पालन करनेवाला है; वह केवल उन्हीं बातों को जानता है जो बुद्धि से जाननेयोग्य हैं; परंतु जो बुद्धि से जाननेयोग्य बातों को जानता है, वह (शकमि पुरुष) वास्तविक तत्त्व को, परब्रह्म परमात्मा को नहीं जानता॥53॥
Among those who know, no one knows the Vedas i.e. their secrets; Because neither anyone can know the secrets of the Vedas nor the knowable divine essence through the means of mind and intellect etc. which come in the way of knowing. The man who knows only the Vedas, the law-enforcer; He knows only those things which are capable of being known by the intellect; But the one who knows the things which are knowable through intellect, he (Sakami Purusha) does not know the real essence, Parabrahma Paramatma. 53॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥