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mahabharat 5.43.42: इसी प्रकार कुछ लोग द्विवेदी, एकवेदी और अनृच* कहलाते हैं। इनमें से मुझे किसको निश्चयपूर्वक ब्राह्मण मानना ​​चाहिए?॥ 42॥   |   mahabharat अध्याय 5.43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  5.43.42 
द्विवेदाश्चैकवेदाश्चाप्यनृचश्च तथा परे।
तेषां तु कतर: स स्याद् यमहं वेद वै द्विजम्॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार कुछ लोग द्विवेदी, एकवेदी और अनृच* कहलाते हैं। इनमें से मुझे किसको निश्चयपूर्वक ब्राह्मण मानना ​​चाहिए?॥ 42॥
 
Similarly, some people are called Dvivedi, Ekavedi and Anricha*. Which of these are those whom I should definitely consider as Brahmins?॥ 42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)