श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  5.43.31 
न च कर्मस्वसिद्धेषु दु:खं तेन च न ग्लपेत्।
सर्वैरेव गुणैर्युक्तो द्रव्यवानपि यो भवेत्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य समस्त गुणों से संपन्न है और धनवान है, यदि उसके कर्म सफल न हों, तो उसे दुःख या ग्लानि नहीं होती ॥31॥
 
If a man who is blessed with all the virtues and is rich, does not feel sad or guilty about his actions if they do not prove successful. 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)