श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  5.43.18 
विकत्थन: स्पृहयालुर्मनस्वी
बिभ्रत् कोपं चपलोऽरक्षणश्च।
एतान् पापा: षण्नरा: पापधर्मान्
प्रकुर्वते नो त्रसन्त: सुदुर्गे॥ १८॥
 
 
अनुवाद
जो लोग अपनी बहुत प्रशंसा करते हैं, लोभी हैं, ज़रा-सा भी अपमान सहन नहीं कर पाते, निरंतर क्रोध करते रहते हैं, चंचल स्वभाव के हैं और अपने आश्रितों की रक्षा नहीं करते - ये छह प्रकार के लोग पापी हैं। वे घोर संकट में भी निर्भय होकर ये पाप कर्म करते हैं।
 
Those who praise themselves too much, are greedy, cannot bear even the slightest insult, are constantly angry, are fickle and do not protect those who are dependent on them - these six types of people are sinners. Even when in great danger, they fearlessly commit these sinful acts.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)