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mahabharat 5.43.13: राजन! जिस (तप) के विषय में आप मुझसे पूछ रहे हैं, वह तप सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति का कारण है; इस (निष्काम) तप के द्वारा ही विद्वान् पुरुष मोक्षरूपी परम अमृत को प्राप्त होते हैं॥13॥   |   mahabharat अध्याय 5.43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 43: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  5.43.13 
तपोमूलमिदं सर्वं यन्मां पृच्छसि क्षत्रिय।
तपसा वेदविद्वांस: परं त्वमृतमाप्नुयु:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
राजन! जिस (तप) के विषय में आप मुझसे पूछ रहे हैं, वह तप सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति का कारण है; इस (निष्काम) तप के द्वारा ही विद्वान् पुरुष मोक्षरूपी परम अमृत को प्राप्त होते हैं॥13॥
 
Rajan! The (penance) about which you are asking me, this penance is the origin of the entire world; It is only through this (selfless) penance that the learned scholars attain the supreme nectar of salvation. 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)