श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 40: धर्मकी महत्ताका प्रतिपादन तथा ब्राह्मण आदि चारों वर्णोंके धर्मका संक्षिप्त वर्णन  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  5.40.28 
ब्रह्म क्षत्रं वैश्यवर्णं च शूद्र:
क्रमेणैतान् न्यायत: पूजयान:।
तुष्टेष्वेतेष्वव्यथो दग्धपाप-
स्त्यक्त्वा देहं स्वर्गसुखानि भुङ्‍‍क्ते॥ २८॥
 
 
अनुवाद
यदि शूद्र ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों की विवेकपूर्वक सेवा करके उन्हें संतुष्ट करता है, तो वह दुःख से मुक्त हो जाता है, पापों से मुक्त हो जाता है और शरीर त्यागने के बाद स्वर्ग का सुख भोगता है ॥28॥
 
If a Shudra satisfies Brahmins, Kshatriyas and Vaishyas by serving them judiciously, then he becomes free from pain, frees from sins and enjoys the happiness of heaven after leaving his body. 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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