श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 40: धर्मकी महत्ताका प्रतिपादन तथा ब्राह्मण आदि चारों वर्णोंके धर्मका संक्षिप्त वर्णन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  5.40.1 
विदुर उवाच
योऽभ्यर्चित: सद्भिरसज्जमान:
करोत्यर्थं शक्तिमहापयित्वा।
क्षिप्रं यशस्तं समुपैति सन्त-
मलं प्रसन्ना हि सुखाय सन्त:॥ १॥
 
 
अनुवाद
विदुर जी कहते हैं - हे राजन! जो श्रेष्ठ पुरुष सज्जनों से आदर पाकर आसक्ति रहित होकर अपनी शक्ति के अनुसार (न्यायपूर्वक) धन कमाता रहता है, वह श्रेष्ठ पुरुष शीघ्र ही उत्तम यश प्राप्त कर लेता है; क्योंकि जिस पर महात्मा प्रसन्न होते हैं, वह सदा सुखी रहता है॥1॥
 
Vidur ji says - O King! The noble man who, after receiving respect from noble men, without attachment, keeps on earning wealth according to his capacity (justly), that noble man soon attains good fame; because the one on whom the saints are pleased, remains happy forever. ॥ 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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