श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 39: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीका नीतियुक्त उपदेश  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  5.39.57 
अनिर्वेद: श्रियो मूलं लाभस्य च शुभस्य च।
महान् भवत्यनिर्विण्ण: सुखं चानन्त्यमश्नुते॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
उद्योग में लगे रहना और उससे विरक्त न होना ही धन, लाभ और कल्याण का मूल है। अतः जो मनुष्य उद्योग का त्याग नहीं करता, वह महान् होकर अनंत सुख भोगता है ॥ 57॥
 
To remain engaged in industry and not to be detached from it is the root of wealth, profit and welfare. Therefore a man who does not give up industry becomes great and enjoys infinite happiness. ॥ 57॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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