श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 39: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीका नीतियुक्त उपदेश  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  5.39.50 
कृतज्ञं धार्मिकं सत्यमक्षुद्रं दृढभक्तिकम्।
जितेन्द्रियं स्थितं स्थित्यां मित्रमत्यागि चेष्यते॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
मित्र वह होना चाहिए जो कृतज्ञ हो, धार्मिक हो, सत्यवादी हो, उदार हो, दृढ़ स्नेह रखता हो, इन्द्रियों को वश में रखता हो, मर्यादा में रहता हो और कभी मित्रता का परित्याग न करता हो ॥50॥
 
A friend should be one who is grateful, religious, truthful, generous, has strong affection, has controlled senses, lives within limits and never abandons friendship. ॥ 50॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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