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श्लोक 5.39.44  |
उपस्थितस्य कामस्य प्रतिवादो न विद्यते।
अपि निर्मुक्तदेहस्य कामरक्तस्य किं पुन:॥ ४४॥ |
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| अनुवाद |
| देह के अहंकार से रहित मनुष्य भी यदि कोई उचित वस्तु उसके सामने प्रस्तुत की जाए तो उसका विरोध नहीं करता; फिर काम-ग्रस्त मनुष्य के विषय में क्या कहा जा सकता है ॥ 44॥ |
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| Even a person devoid of ego of the body does not oppose a just object if it is presented to him; then what can one say about a man obsessed with lust? ॥ 44॥ |
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