श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 39: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीका नीतियुक्त उपदेश  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  5.39.44 
उपस्थितस्य कामस्य प्रतिवादो न विद्यते।
अपि निर्मुक्तदेहस्य कामरक्तस्य किं पुन:॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
देह के अहंकार से रहित मनुष्य भी यदि कोई उचित वस्तु उसके सामने प्रस्तुत की जाए तो उसका विरोध नहीं करता; फिर काम-ग्रस्त मनुष्य के विषय में क्या कहा जा सकता है ॥ 44॥
 
Even a person devoid of ego of the body does not oppose a just object if it is presented to him; then what can one say about a man obsessed with lust? ॥ 44॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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