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श्लोक 5.39.41  |
मत्या परीक्ष्य मेधावी बुद्धॺा सम्पाद्य चासकृत्।
श्रुत्वा दृष्ट्वाथ विज्ञाय प्राज्ञैर्मैत्रीं समाचरेत्॥ ४१॥ |
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| अनुवाद |
| बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि वह अपने अनुभव से बार-बार किसी व्यक्ति का मूल्य निश्चित करे और दूसरों से सुनकर तथा स्वयं देखकर, विचार करके विद्वानों से मित्रता करे ॥ 41॥ |
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| A wise man should repeatedly ascertain the worth of a person by his own experience and after hearing from others and seeing for himself, he should make friends with learned persons after due deliberation. ॥ 41॥ |
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