| श्री महाभारत » पर्व 5: उद्योग पर्व » अध्याय 39: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीका नीतियुक्त उपदेश » श्लोक 4 |
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| | | | श्लोक 5.39.4  | द्वेष्यो न साधुर्भवति न मेधावी न पण्डित:।
प्रिये शुभानि कार्याणि द्वेष्ये पापानि चैव ह॥ ४॥ | | | | | | अनुवाद | | जिससे घृणा की जाती है, वह न तो साधु होता है, न विद्वान् होता है, न ज्ञानी होता है। प्रिय व्यक्ति (मित्र आदि) के सभी कर्म शुभ प्रतीत होते हैं और शत्रु के सभी कर्म पापमय प्रतीत होते हैं। ॥4॥ | | | | The person who is hated is neither a saint, nor a learned person, nor a wise man. All the deeds of a dear person (friend etc.) appear to be auspicious and all the deeds of an enemy appear to be sinful. ॥ 4॥ | | ✨ ai-generated | | |
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