श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 39: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीका नीतियुक्त उपदेश  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  5.39.35 
पापोदयफलं विद्वान् यो नारभति वर्धते।
यस्तु पूर्वकृतं पापमविमृश्यानुवर्तते।
अगाधपङ्के दुर्मेधा विषमे विनिपात्यते॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
जो विद्वान् मनुष्य पापमय कर्म नहीं करता, वह उन्नति करता है; किन्तु जो मिथ्या बुद्धिवाला मनुष्य अपने पूर्वजन्म के पापों का चिन्तन नहीं करता और उनका ही अनुसरण करता रहता है, वह कीचड़ से भरे हुए घोर नरक में गिराया जाता है ॥ 35॥
 
A learned man who does not undertake activities that lead to sinful results progresses; but a man of wrong intellect who does not reflect on his past sins and continues to follow them is thrown into a deep hell filled with mud. ॥ 35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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