श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 38: विदुरजीका नीतियुक्त उपदेश  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  5.38.45 
यं प्रशंसन्ति कितवा यं प्रशंसन्ति चारणा:।
यं प्रशंसन्ति बन्धक्यो न स जीवति मानव:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
(केवल) वह मनुष्य जिसकी प्रशंसा जुआरी करते हैं, नर्तकियाँ जिसका गुणगान करती हैं और वेश्याएँ जिसका गुणगान करती हैं, वह जीवित रहते हुए भी मृतक के समान है ॥ 45॥
 
(Only) the man whom gamblers praise, whose praises dancers sing and whose glories prostitutes extol, is like a dead man while alive. ॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)