श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 38: विदुरजीका नीतियुक्त उपदेश  »  श्लोक 18-19h
 
 
श्लोक  5.38.18-19h 
नासुहृत् परमं मन्त्रं भारतार्हति वेदितुम्॥ १८॥
अपण्डितो वापि सुहृत् पण्डितो वाप्यनात्मवान्।
 
 
अनुवाद
हे भारत! जो मित्र नहीं है, मित्र होकर भी विद्वान नहीं है और विद्वान होकर भी जिसका मन वश में नहीं है, वह गुप्त मंत्रणा जानने के योग्य नहीं है। ॥18 1/2॥
 
O Bharata! He who is not a friend, who is not a learned man despite being a friend, and whose mind is not under control despite being a learned man, is not worthy of knowing one's secret advice. ॥ 18 1/2 ॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)