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श्लोक 5.36.70  |
पुरा ह्युक्तं नाकरोस्त्वं वचो मे
द्यूते जितां द्रौपदीं प्रेक्ष्य राजन्।
दुर्योधनं वारयेत्यक्षवत्यां
कितवत्वं पण्डिता वर्जयन्ति॥ ७०॥ |
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| अनुवाद |
| राजन! द्रौपदी को प्रथम दृष्टया द्यूत-क्रीड़ा में विजयी होते देखकर मैंने आपसे कहा था, 'दुर्योधन को रोको, जो जुए में लिप्त है। विद्वान लोग इस छल-कपट का निषेध करते हैं।' परन्तु आपने मेरी बात नहीं मानी। |
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| King! Having seen Draupadi being the winner in the first game of dice, I had said to you, 'Stop Duryodhan who is engrossed in gambling. Learned people forbid this trickery.' But you did not listen to me. |
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