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mahabharat 5.36.64: इसी प्रकार समस्त गुणों से संपन्न पुरुष भी अकेला होने पर शत्रु द्वारा अपने वश में माना जाता है, जैसे वायु एकांत वृक्ष को अपने वश में मानती है॥ 64॥   |   mahabharat अध्याय 5.36: दत्तात्रेय और साध्यदेवताओंके संवादका उल्लेख करके महाकुलीन लोगोंका लक्षण बतलाते हुए विदुरका धृतराष्ट्रको समझाना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 36: दत्तात्रेय और साध्यदेवताओंके संवादका उल्लेख करके महाकुलीन लोगोंका लक्षण बतलाते हुए विदुरका धृतराष्ट्रको समझाना  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  5.36.64 
एवं मनुष्यमप्येकं गुणैरपि समन्वितम्।
शक्यं द्विषन्तो मन्यन्ते वायुर्द्रुममिवैकजम्॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार समस्त गुणों से संपन्न पुरुष भी अकेला होने पर शत्रु द्वारा अपने वश में माना जाता है, जैसे वायु एकांत वृक्ष को अपने वश में मानती है॥ 64॥
 
Similarly, even a man endowed with all the virtues is considered by the enemy to be within his power when he is alone, like the wind considers a solitary tree to be within its power.॥ 64॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)