श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 36: दत्तात्रेय और साध्यदेवताओंके संवादका उल्लेख करके महाकुलीन लोगोंका लक्षण बतलाते हुए विदुरका धृतराष्ट्रको समझाना  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  5.36.53 
अनाश्रिता दानपुण्यं वेदपुण्यमनाश्रिता:।
रागद्वेषविनिर्मुक्ता विचरन्तीह मोक्षिण:॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
मोक्ष की इच्छा रखने वाले मनुष्य न तो दान के पुण्य का आश्रय लेते हैं, न वेद के पुण्य का; अपितु वे राग-द्वेष से रहित होकर निःस्वार्थ भाव से इस संसार में विचरण करते हैं॥53॥
 
People who desire salvation do not take refuge in the virtue of charity, nor even in the virtue of the Vedas; But they wander in this world selflessly, free from attachment and hatred. 53॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas