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श्लोक 5.36.48  |
चलानि हीमानि षडिन्द्रियाणि
तेषां यद् यद् वर्धते यत्र यत्र।
ततस्तत: स्रवते बुद्धिरस्य
छिद्रोदकुम्भादिव नित्यमम्भ:॥ ४८॥ |
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| अनुवाद |
| ये छहों इन्द्रियाँ बड़ी चंचल हैं; जो भी इन्द्रिय जिस विषय की ओर जाती है, वहाँ बुद्धि क्षीण हो जाती है, जैसे फूटे हुए घड़े से जल सदैव रिसता रहता है ॥48॥ |
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| These six senses are very fickle; whichever sense moves towards whichever object, the intellect gets weakened there, just like water always leaks from a broken pot. ॥ 48॥ |
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