श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 36: दत्तात्रेय और साध्यदेवताओंके संवादका उल्लेख करके महाकुलीन लोगोंका लक्षण बतलाते हुए विदुरका धृतराष्ट्रको समझाना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  5.36.47 
सुखं च दु:खं च भवाभवौ च
लाभालाभौ मरणं जीवितं च।
पर्यायश: सर्वमेते स्पृशन्ति
तस्माद् धीरो न च हृष्येन्न शोचेत्॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
सुख-दुःख, उत्पत्ति-विनाश, लाभ-हानि और जीवन-मृत्यु- ये क्रमशः सबको प्राप्त होते हैं; अतः धैर्यवान पुरुष को इनके लिए न तो हर्ष करना चाहिए और न शोक करना चाहिए ॥47॥
 
Happiness-sorrow, creation-destruction, profit-loss and life-death - these are received by everyone respectively; Therefore, a patient person should not rejoice or mourn for them. 47॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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