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श्लोक 5.36.33  |
यश्च नो ब्राह्मणान् हन्याद् यश्च नो ब्राह्मणान् द्विषेत्।
न न: स समितिं गच्छेद् यश्च नो निर्वपेत् पितॄन्॥ ३३॥ |
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| अनुवाद |
| हममें से जो कोई ब्राह्मण की हत्या करता है, ब्राह्मणों से द्वेष रखता है तथा पितरों का पिण्डदान और तर्पण नहीं करता, उसे हमारी सभा में प्रवेश नहीं करना चाहिए। 33. |
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| Whoever amongst us kills a Brahmin, bears enmity towards Brahmins and does not offer Pinddan and Tarpan to the ancestors should not enter our assembly. 33. |
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