श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 36: दत्तात्रेय और साध्यदेवताओंके संवादका उल्लेख करके महाकुलीन लोगोंका लक्षण बतलाते हुए विदुरका धृतराष्ट्रको समझाना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  5.36.32 
मा न: कुले वैरकृत् कश्चिदस्तु
राजामात्यो मा परस्वापहारी।
मित्रद्रोही नैकृतिकोऽनृती वा
पूर्वाशी वा पितृदेवातिथिभ्य:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
हमारे कुल में कोई शत्रु न हो, कोई राजा या मंत्री न हो जो दूसरों का धन छीन ले, कोई मित्र से विश्वासघात करने वाला, छल करने वाला और असत्य बोलने वाला न हो, इसी प्रकार कोई ऐसा न हो जो माता-पिता, देवता और अतिथियों को भोजन कराए बिना स्वयं भोजन कर ले॥ 32॥
 
There should not be any enemy in our family, there should not be any king or minister who snatches the wealth of others and there should not be any one who betrays friends, is deceitful and untruthful. Similarly, there should not be any one who takes food before feeding the parents, Gods and guests.॥ 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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