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श्लोक 5.36.21  |
प्राप्नोति वै वित्तमसद्बलेन
नित्योत्थानात् प्रज्ञया पौरुषेण।
न त्वेव सम्यग् लभते प्रशंसां
न वृत्तमाप्नोति महाकुलानाम्॥ २१॥ |
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| अनुवाद |
| मनुष्य दुष्टों के बल से, निरन्तर प्रयत्न से, बुद्धि से और परिश्रम से धन तो प्राप्त कर सकता है; परन्तु वह सज्जनों का मान और सदाचार कभी पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं कर सकता ॥ 21॥ |
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| A man may acquire wealth by the power of evil men, by continuous efforts, by wisdom and by hard work; but he can never completely attain the honour and good conduct of noble men. ॥ 21॥ |
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