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mahabharat 5.35.71: जिन शिष्यों ने अपने मन और इन्द्रियों को वश में कर लिया है, उनके शासक गुरु हैं, दुष्टों के शासक राजा हैं और जो गुप्त रूप से पाप करते हैं, उनके शासक सूर्यपुत्र यमराज हैं ॥ 71॥   |   mahabharat अध्याय 5.35: विदुरके द्वारा केशिनीके लिये सुधन्वाके साथ विरोचनके विवादका वर्णन करते हुए धृतराष्ट्रको धर्मोपदेश   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  5.35.71 
गुरुरात्मवतां शास्ता शास्ता राजा दुरात्मनाम्।
अथ प्रच्छन्नपापानां शास्ता वैवस्वतो यम:॥ ७१॥
 
 
अनुवाद
जिन शिष्यों ने अपने मन और इन्द्रियों को वश में कर लिया है, उनके शासक गुरु हैं, दुष्टों के शासक राजा हैं और जो गुप्त रूप से पाप करते हैं, उनके शासक सूर्यपुत्र यमराज हैं ॥ 71॥
 
The ruler of the disciples who have controlled their mind and senses is the Guru, the ruler of the wicked is the king and the ruler of those who commit sins secretly is Yamaraja, the son of the Sun. ॥ 71॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)