श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 35: विदुरके द्वारा केशिनीके लिये सुधन्वाके साथ विरोचनके विवादका वर्णन करते हुए धृतराष्ट्रको धर्मोपदेश  »  श्लोक 70
 
 
श्लोक  5.35.70 
धनेनाधर्मलब्धेन यच्छिद्रमपिधीयते।
असंवृतं तद् भवति ततोऽन्यदवदीर्यते॥ ७०॥
 
 
अनुवाद
जो दोष पाप से अर्जित धन के द्वारा छिपाया जाता है, वह छिप नहीं सकता; (परन्तु दोष को छिपाने से) उससे भिन्न दूसरा दोष प्रकट हो जाता है ॥70॥
 
The fault which is concealed by means of wealth acquired through wrongdoings cannot be concealed; (but by concealing the fault) a new fault, different from that, becomes manifest. ॥ 70॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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