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श्लोक  5.35.62 
नष्टप्रज्ञ: पापमेव नित्यमारभते नर:।
पुण्यं प्रज्ञां वर्धयति क्रियमाणं पुन: पुन:॥ ६२॥
 
 
अनुवाद
जिस व्यक्ति की बुद्धि नष्ट हो जाती है, वह सदैव पाप करता रहता है। इसी प्रकार बार-बार किए गए अच्छे कर्मों से बुद्धि बढ़ती है। 62.
 
A person whose intellect is destroyed, keeps committing sins always. Similarly, good deeds done repeatedly increase the intellect. 62.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)