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श्लोक 5.35.51  |
श्रीर्मङ्गलात् प्रभवति प्रागल्भ्यात् सम्प्रवर्धते।
दाक्ष्यात् तु कुरुते मूलं संयमात् प्रतितिष्ठति॥ ५१॥ |
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| अनुवाद |
| लक्ष्मी शुभ कर्मों से उत्पन्न होती है, वाक्पटुता से बढ़ती है, चतुराई से जड़ पकड़ती है और संयम से सुरक्षित रहती है ॥51॥ |
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| Lakshmi is born from good deeds, grows with eloquence, takes root with cleverness and is protected by self-restraint. ॥ 51॥ |
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