श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 35: विदुरके द्वारा केशिनीके लिये सुधन्वाके साथ विरोचनके विवादका वर्णन करते हुए धृतराष्ट्रको धर्मोपदेश  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  5.35.25 
विरोचन उवाच
न मे सुधन्वना सख्यं प्राणयोर्विपणावहे।
प्रह्राद तत्त्वं पृच्छामि मा प्रश्नमनृतं वदे:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
विरोचन ने कहा—पिताजी! मैं सुधन्वा का मित्र नहीं हूँ। हम दोनों अपने प्राणों को जोखिम में डाल रहे हैं। मैं आपसे सत्य पूछ रहा हूँ। मेरे प्रश्न का झूठा उत्तर न दें॥ 25॥
 
Virochan said— Father! I am not friends with Sudhanva. We both are risking our lives. I am asking you the truth. Do not give a false answer to my question.॥ 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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