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श्लोक 5.35.2  |
विदुर उवाच
सर्वतीर्थेषु वा स्नानं सर्वभूतेषु चार्जवम्।
उभे त्वेते समे स्यातामार्जवं वा विशिष्यते॥ २॥ |
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| अनुवाद |
| विदुरजी ने कहा- राजन! समस्त तीर्थों में स्नान करना तथा समस्त प्राणियों के साथ सौम्य व्यवहार करना- दोनों एक ही हैं; अर्थात् सौम्य व्यवहार का विशेष महत्व है॥2॥ |
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| Vidurji said- Rajan! Bathing in all places of pilgrimage and treating all living beings with gentleness – both are the same; Or gentle behavior has special importance. 2॥ |
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