श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 35: विदुरके द्वारा केशिनीके लिये सुधन्वाके साथ विरोचनके विवादका वर्णन करते हुए धृतराष्ट्रको धर्मोपदेश  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  5.35.2 
विदुर उवाच
सर्वतीर्थेषु वा स्नानं सर्वभूतेषु चार्जवम्।
उभे त्वेते समे स्यातामार्जवं वा विशिष्यते॥ २॥
 
 
अनुवाद
विदुरजी ने कहा- राजन! समस्त तीर्थों में स्नान करना तथा समस्त प्राणियों के साथ सौम्य व्यवहार करना- दोनों एक ही हैं; अर्थात् सौम्य व्यवहार का विशेष महत्व है॥2॥
 
Vidurji said- Rajan! Bathing in all places of pilgrimage and treating all living beings with gentleness – both are the same; Or gentle behavior has special importance. 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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