श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 35: विदुरके द्वारा केशिनीके लिये सुधन्वाके साथ विरोचनके विवादका वर्णन करते हुए धृतराष्ट्रको धर्मोपदेश  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  5.35.14 
सुधन्वोवाच
अन्वालभे हिरण्मयं प्राह्रादे ते वरासनम्।
एकत्वमुपसम्पन्नो न त्वासेऽहं त्वया सह॥ १४॥
 
 
अनुवाद
सुधन्वा ने कहा - हे प्रह्लादपुत्र! मैं तुम्हारे इस सुन्दर स्वर्णमय सिंहासन को केवल स्पर्श ही कर सकता हूँ, परन्तु इस पर तुम्हारे साथ नहीं बैठ सकता; क्योंकि ऐसा करने से हम दोनों समान हो जाएँगे॥14॥
 
Sudhanva said - O son of Prahlad, I can only touch this beautiful golden throne of yours, but I cannot sit on it with you; because by doing so we both will become equal. ॥ 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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