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mahabharat 5.35.1: धृतराष्ट्र बोले, "हे महात्मा बुद्ध! आपको पुनः धर्म और अर्थ से परिपूर्ण वचन बोलने चाहिए। मैं उन्हें सुनकर संतुष्ट नहीं हूँ। आप इस विषय में विचित्र बातें कह रहे हैं।"   |   mahabharat अध्याय 5.35: विदुरके द्वारा केशिनीके लिये सुधन्वाके साथ विरोचनके विवादका वर्णन करते हुए धृतराष्ट्रको धर्मोपदेश   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  5.35.1 
धृतराष्ट्र उवाच
ब्रूहि भूयो महाबुद्धे धर्मार्थसहितं वच:।
शृण्वतो नास्ति मे तृप्तिर्विचित्राणीह भाषसे॥ १॥
 
 
अनुवाद
धृतराष्ट्र बोले, "हे महात्मा बुद्ध! आपको पुनः धर्म और अर्थ से परिपूर्ण वचन बोलने चाहिए। मैं उन्हें सुनकर संतुष्ट नहीं हूँ। आप इस विषय में विचित्र बातें कह रहे हैं।"
 
Dhritarashtra said, "O great Buddha! You should again speak words full of Dharma and Artha. I am not satisfied by listening to them. You are saying strange things in this matter."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)