श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 34: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीके नीतियुक्त वचन  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  5.34.64 
आत्मनाऽऽत्मानमन्विच्छेन्मनोबुद्धीन्द्रियैर्यतै:।
आत्मा ह्येवात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन:॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
मन, बुद्धि और इन्द्रियों को वश में करके स्वयं आत्मा को जानने की इच्छा करनी चाहिए; क्योंकि आत्मा ही अपना मित्र है और आत्मा ही अपना शत्रु है ॥ 64॥
 
By subjugating the mind, intellect and the senses, one should desire to know the Self by himself; because the Self is his own friend and the Self is his own enemy. ॥ 64॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)