श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 34: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीके नीतियुक्त वचन  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  5.34.42 
य ईर्षु: परवित्तेषु रूपे वीर्ये कुलान्वये।
सुखसौभाग्यसत्कारे तस्य व्याधिरनन्तक:॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
जो दूसरों के धन, रूप, पराक्रम, कुलीनता, सुख, सौभाग्य और मान से ईर्ष्या करता है, उसका रोग असाध्य है ॥ 42॥
 
He who is jealous of others' wealth, beauty, valour, nobility, happiness, good fortune and honour, his disease is incurable. ॥ 42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)