श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 34: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीके नीतियुक्त वचन  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  5.34.32 
अप्युन्मत्तात् प्रलपतो बालाच्च परिजल्पत:।
सर्वत: सारमादद्यादश्मभ्य इव काञ्चनम्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
जो बालक बकवास करता है, पागल है, या बकवादी है, उससे सबका सार उसी प्रकार निकाल लेना चाहिए, जैसे पत्थर से सोना निकाल लिया जाता है ॥32॥
 
One should take the essence of everything from a child who talks nonsense, is insane, or is a blabber, just as one extracts gold from stones. ॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)